Thursday, 3 February 2011

एक हाथ की दास्ताँ

एक सच्ची घटना पर आधारित जो मेरे भाई के साथ दिल्ली के भीड़ भाड़ वाले इलाके में घटित हुई:

उसका बचपन उससे कुछ पहले चला था,
और वक़्त से पहले वो जवानी की देहलीज पर खड़ा था.

एक पिय्यक्कड़ बाप ने बिन पूछे उसे भिखारी बना दिया,
एक हाथ का है ये कहके रस्ते पर बिठा दिया.

वो चिल्लाया, वो झल्लाया. 
एक हुआ तो क्या हुआ, भारी सब पर बैठेगा,

एक हाथ से जीतूँगा में, तू क्यों कर मुझसे ऐठेगा.

कद बढ़ा काठी बढ़ी, बढ़ा न लेकिन हाथ,
दूजे हाथ ने ढूँढ ली, इस विप्पत्ति की काट.

दर दर भटका, पल पल चटका उस मन का विश्वास,
भिड बैठूँगा, मिट जाऊंगा, नहीं बनूँगा लाचार.

एक हाथ से थाम ली रिक्शा, हमको दी जीने की शिक्षा,
मेरा अज्ञानी मन उस ज्ञानी से मांग बैठा भिक्षा.

उस निर्धन की खिचती टाँगे, भिचती मुट्ठी, पढ़ा गयी ये पाठ,
तीन पहिये उसके रिक्शे के बड़ी बताते बात,
हिम्मत को बोयो, आशा से सीचों, फलेंगे वृक्ष अपार.

Monday, 31 January 2011

रण

जब देश विकट संकट में आया, सब और था मातम छाया,
जब कोई राह न दिखती थी और बस लाचारी ही बिकती थी,
तब वीरो ने ठान लिया, इसको अपना जीवन मान लिया,

अब खून की होली खेलेंगे और बेचारे से न डोलेंगे,
दुश्मन के तेज प्रहारों को हम अपने सीनों पर झेलेंगे,
एक एक घर ने उस दिन पर अपने कई कई जीवन वार दिए,
उन साधारण से इंसानों में कही अली तो कही राम मिले.

एक एक वीर रोके न रुकता था, कोई विरला अवतार ही दिखता था,
रक्त के उस सागर में कई मोती बस डूब गए,
कुछ बोले तो कुछ बिन बोले, कई पावन रिश्ते टूट गए,

उन वीरो ने अपने कंधो पर जब दुश्मन की लाशें ढोयी थी,
तन उन सिंहो की बेबस आँखें भी रोई थी.
कोई निपट अकेला बैठा था तो उसने यु भी सोच लिया,
उस लाशो के जंगल में से एक छोटा बच्चा ढूँढ लिया,

उस बच्चे की आँखों से कुछ निश्चल सपने बहते थे,
अब सूने से एक आँगन में बस उसके अपने रहते है,

बूढ़े बरगद के पेड़ के नीचे एक टूटी गुडिया सोयी थी,
इस कोलाहल से कोसो दूर बस अपनी दुनिया में खोयी थी,

कुछ में जान अभी थी बाकी, कुछ की सांस अभी थी जारी,
कुछ थाम रहे थे जीवन की डोरी, देश भक्ति के नारों से,
कुछ अधसोए से बतिया रहे थे नभ के तारो से.

रात का मंजर लील चूका था, सब जलते बुझते अंगारों को,
कही पतंगा झूल रहा, शम्मा पी लूट जाने को.

एक हाथ हलके से डोला, उसने अपना भार टटोला,
धीरे से उठकर बैठी काया, देखि उसने जलती माया,
कापं गया दिल, गला भर्राया उसने जब मुह खोला.

कैसे कोई लूट गया सब, कैसे पीछे छूट गया सब,
अब यहाँ सियासत होगी, बलिदानों पर बोली होगी,
कही किसी विधवा की सिगड़ी पर पकती नेताओ की रोटी होगी.

कर ले प्रण हम,  न होगी रण अब,
मिल बैठे हम, आज यहाँ मिलके, अभी तो बिछड़े थे हम कलके,
ऐसे भी दिन लायेंगे हम, सोचा न था ये सब हमने.

आपका अपना
सिद्धार्थ









Wednesday, 29 December 2010

वो खिलौने की दूकान

बात ज्यादा पुरानी नहीं है पर ध्यान में आज  आयी. जब सोचने बैठा तो न दुख हुआ और न ही सुख का एहसास हुआ. कई बार हमारा जीवन हमे कैसे कैसे रस्तो से लेकर गुजरता है बस इसी बात पर थोड़ी हैरत हुई.
हुआ यु की हमारे शहर में एक खिलौने की दूकान हुआ करती थी, मेरी उम्र कोई चार या पांच वर्ष रही होगी, तभी से उस दूकान और उसमे रखे तरह तरह खिलौनों को में कोतुहल की दृष्टि से देखा करता था. कभी कभी विशेष अवसर मेरे बाबा मुझे दूकान से महंगे खिलौने लाकर भी देते थे लेकिन स्त्री हठ की तरह ही बाल हठ की पूर्ती करना भी असंभव कार्य है. तो में उस दूकान से कभी ख़ुशी कुशी नहीं लौटा, मेरी टोकरी में एक खिलौना हमेशा कम ही लगता था मुझे. खैर, मेरे बाबा ने यथा संभव प्रयत्न किये मेरे नासमझ मन को समझाने के.
मेरे बाल मन पर उस खिलौने की दूकान ने एक विशेष स्थान बना लिया था, कई साल गुज़र गए और में अपने सभी दोस्तों की तरह जीवन की भागादौड़ी में व्यस्त हो गया, कभी वक़्त ही नहीं मिला उस दूकान की तरफ मुद के देखने का.
लेकिन कई बरस के बाद, जब उस रोज़ मुझे अपने भांजे के लिए एक खिलौना खरीदने की सूझी तो मेने उसी दुकान की और देखा, लेकिन ये दूकान मेरे बचपन वाली दूकान से काफी अलग थी, जिन खिलौनों को देखकर मेरी आँखों में एक चमक आ जाती थी, आज वही आँखें उन खिलौनों में ना चाहते हुए भी कमिय ढूँढ रही थी. अपने बचपन की यादो में ख़ास स्थान रखने वाली इस दूकान को थोडा सा सम्मान देने की मेरी हर कोशिश नाकाम होती जा रही थी और आखिर में हार ही गया और जिस दूकान से में हमेशा और पाने की छह में निकला करता था, आज खाली हाथ निकल आया, किसी और बेहतर दूकान की तलाश में, शायद किसी और बेहतर शहर के लिए में आगे निकल आया.

Tuesday, 23 November 2010

प्रजातंत्र

सुबह उठते ही दैनिक समाचारों से रूबरू होने की आदत सभी को होती है. कुछ लोग इसके लिए अख़बार की बाट जोहते है तो कुछ न्यूज़ चेनल्स पर भरोसा करते है. आज का दिन और दिनों से कुछ अलग था क्यूंकि आज बिहार विधानसभा के चुनावो के नतीजे आने वाले थे.
जैसा की अनुमानित था, नितीश कुमार एवं भाजपा गठबंधन ने सत्ता काबिज कर ली. हालाकि ये कोई चौकाने वाली बात नहीं थी. चुनाव में किसी की हार एवं किस्सी की जीत होती ही है, कुछ दिग्भ्रमित लोग त्रिशंकु सभा के पक्ष में भी रहते है.
लेकिन आज की बात विशेष बनाने में एक १० से १२ वर्षीय बालक का योगदान रहा. हुआ यु की घर में रद्दी जमा हो चुकी थी एवं हमसे लाख गुहार लगाने के बाद भी जब हम एक रद्दी वाले को नहीं ढूँढ पाए तब हमारी धर्मपत्नी ही एक रद्दी वाले का पता निकाल लायी. सुबह के करीब ९ बजे थे, बिहार में हुए घमासान को सभी न्यूज़ चेनल्स चटखारे ले ले कर परोस रहे थे और यहाँ ये गरीब, इन सब बातो से बेखबर हो, रद्दी तौल रहा था. हमे उसके बोलचाल से अंदाजा हो ही चूका था लेकिन फिर भी पूछ बैठे, क्यों भई बिहार से हो क्या? वो हाँ बोल कर हमारी आँखों में अपनापन ढूँढने की कोशिश सी करने लगा. हमने उसे टीवी पर चल रहे प्रोग्राम की और इंगित करते हुए कहा, ये पता है क्या चल रहा है, उसने इस प्रश्न की अपेक्षा हमसे नहीं की थी लेकिन फिर भी थोड़ी देर टीवी पर देखने के बाद अपनी मुंडी हिला कर साफ़ इंकार कर दिया और बोला, नाही भैया, हमे नाही पता जे क्या है.
अपनी आज की रोटी, आज का खाना और आज का आशियाना जैसे महतवपूर्ण सवालों में उलझे हुए उस बालक के समक्ष देश से जुडी ये अहम् खबरें भी बौनी नज़र आई, हमने एक गैर जिम्मेदार नागरिक की तरह ठंडी सांस भरी और उसे उसका हिसाब किताब कर रवाना किया.
विश्व के सबसे बड़े प्रजातंत्र में बच्चो की शिक्षा एवं उनके भविष्य जैसे मुद्दों की ऐसी अवहेलना पर हम एक बार फिर असहाय नज़र आये.

सिद्धार्थ

Wednesday, 29 September 2010

फैसले की घडी

जो सहना था वो सह चुके, जो खोना था वो खो चुके,
अब काहे का रोना है, अब तो फैसला होना है.

बहुत पुरानी बात है, हम भी भगवा लेकर दौड़े थे, खाकी की एक चड्डी और हाथ में डंडा लेकर बोले थे.
अब डंडे की जगह ठन्डे बस्ते में है, कल के मसीहा, आज सभी रस्ते में है.


पुश्तैनी सी एक इमारत जब ढेहना था तब डह गयी, जो कहना था सो कह गयी,
अब लकीरे हम क्यों पीटे,रस्सा तानी हम क्यों खिचे.

कई सवाल ऐसे भी थे जो मस्जिद के संग डह न सके, और भगवे की धरा के संग बह न सके.

वो सवाल हम आज भी चिढाते है,  भूके बच्चे जैसे बिलबिलाते है,
वो सवाल हमे कचोटते है, और हम बैठे ये सोचते है.

जो सहना था वो सह चुके, जो खोना था वो खो चुके,
अब काहे का रोना है, अब तो फैसला होना है.

Thursday, 23 September 2010

और पुल टूट गया

जैसे तैसे तो बना था, कई फाईलो का सहारा लेकर तना था.
अपने भाग्य पर इठला रहा था और अभी अभी बनने की ख़ुशी में इतरा रहा था.

बारिश का एक छीटा पुल को चिढ़ा गया, सौ टन के जंगले को हिला गया,
पुल ने अफसरों की नीयत को टटोला, फिर कापते शब्दों में बोला.

अपनी थाली में से मुझे भी कुछ तो खिलाते, सीमेंट न सही, कम से कम रेट तो अच्छी क्वालिटी की मिलाते,
दाढ़ी खुजाते अफसर बोले, हमसे कुछ बचता तो तुझे भी पिलाते.

खिसयाना सा होकर पुल ललकारा, अरे नासपीटो कुछ तो शर्म करते,
ज्यादा नहीं तो कम से कम एखाद साल का तो इन्तेजार करते.

देश की इज्जत लूट ली और दुनिया को जाता दिया,
अपनी कलुषित इच्छा की चलते, देश को नंगा करके बता दिया.

शान से तना हुआ पुल असमंजस में झूल गया,
और एक रात की बारिश में पुल का संबल टूट गया.

Tuesday, 7 September 2010

भ्रष्ट मंडल खेल

पढोगे लिखोगे तो बनोगे नवाब, ये सुनते सुनते हमारी पीढ़ी के कान पक गए. हमारी पीढ़ी, चलिए दो शब्द इसके बारे मैं भी बोल लेते है. हमारी पीढ़ी मतलब आज़ादी के बाद की तीसरी पीढ़ी.  इस पीढ़ी के पूर्वजो ने हर चीज मैं कटौती झेली. कभी बच्चो के दूध की कटौती तो कभी राशन की कटौती, कभी पानी की आपूर्ति को लेकर बैचनी तो कभी बिजली को लेकर तनातनी. छोटी उम्र मैं बड़ी जिम्मेदारियां उठाये, घिसते तलवे लेकिन चमकती आँखें लिए एक खुशाल परिवार, एक समृद्ध देश का सपना सजाया था पूर्वजो ने.
इस सपने को सहेजना हमारी पीढ़ी के लिए काफी जरूरी था. पूर्वजो की मेहनत को ऐसे ही कैसे जाया कर सकते है. इसी उधेड़ बून में कब बचपन निकला और कब जवानी को अलविदा कहते हुए अदेध अवस्था में प्रवेश कर गए पता ही नहीं चला. हमारे पूर्वजो ने हमे कटौतियो से कोसो दूर रकते की कोशिश की.
बिजली की कटौती से लड़ने को इन्वेर्टर लगा दिए गए, पानी की कमी से भिड़ने को तानकर मंगवा लिए गए. दूध, दही और घी की नदिया बहा दी गयी. इन्ही नदियों में कभी माँ की साडी, कभी बाप की घडी, कभी दादाजी का चश्मा स्वाहा हो गया, मगर मजाल है की किसी ने उफ़ तक की हो या किसी माथे पर शिकन तक दिखी हो, दिखा तो सिर्फ सुकून.एक सुकून जो न पैसे से ख़रीदा जा सकता है और ना ही किसी राशन की दुकान पर मिलता है. 
बलिदान खाली नहीं गए, रंग लाये, देश को कई क्षेत्रो में अव्वल बनाया. कही बम बनाये जा रहे थे तो कही रोककेट, कही कृषि के क्षेत्र में क्रान्ति आ रही थी तो कही शिक्षा लोगो को आत्मनिर्भर बना रही थी. धरती का सीना चीर कर सोना लहरा रहा था, अनाज के लिए अब हम औरो का मुंह नहीं ताकते थे. विज्ञान ने प्रगति की रफ़्तार कई गुना बढ़ा दी.
कुछ लोग नया नज़रिया लेकर आये, भारत को विश्व पटल पर स्थायी दर्जा और सम्मान मिले इसके लिए भरसक प्रयत्न चालू हुए. कई शिक्षाविद और विदुषी लोगो ने यथा संभव प्रयत्न किये, राष्ट्रमंडल खेलो को भारत में सफल आयोजित करने की चेष्टा  जाहिर की गयी. कईयों की आँखें खुली, तो कईयों की खुली ही रही गयी. बड़े बड़े वादे हुए, कुछ पूरे हुए और कुछ के पूरे होने की आस में कईयों की सांस अटक गयी.
पूर्वजो की तपस्या को भंग करने में मंत्री नामक अपसरा ने तनिक भी संकोच नहीं किया. स्वयं को राष्ट्र का प्रतिनिधि बताने वाले भी भष्टाचार रुपी नन्गता को बर्दाश्त कर गए. कभी देश के मान का प्रतिक रही पगड़ी को भी इन लोगो ने ठोकर मारकर उछाल दिया.
मेरी दरख्वास्त है माननीय प्रधानमंत्रीजी से की की देश की गरिमा के साथ हो रहे इस खिलवाड़ को रोका जाए. इस महान देश के स्वाभिमानी पूर्वजो एवं कर्ताव्य्निष्ट नागरिको के सम्मान को आहत न होने दिया जाये. इसी स्वाभिमान एवं सम्मान के लिए हमने न जाने कितनी आहुतिय दे दी और ना जाने कितने मुश्किल वक़्त एकजुट हो कर झेल गए.